
99 वर्ष की उम्र में भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ते हैं चंद्रशेखर यादव…शिक्षा के संस्कार से खड़ा हुआ परिवार…आज खगड़िया में मेडिकल कॉलेज से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक फैली सेवा की रोशनी…
99 वर्ष की उम्र में भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ते हैं चंद्रशेखर यादव…शिक्षा के संस्कार से खड़ा हुआ परिवार…आज खगड़िया में मेडिकल कॉलेज से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक फैली सेवा की रोशनी…
खगड़िया / कौशी एक्सप्रेस/ उम्र महज एक संख्या है—इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक चंद्रशेखर यादव। उम्र के 99वें पड़ाव पर पहुंच चुके सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक चंद्रशेखर यादव आज भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका अध्ययन के प्रति लगाव, अनुशासन और सक्रिय जीवनशैली लोगों के लिए प्रेरणा का विषय है। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र को समर्पित किया और प्रधानाध्यापक के रूप में कई पीढ़ियों को ज्ञान एवं संस्कार की राह दिखाई। उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय माधुरी देवी ने भी परिवार को संस्कार, अनुशासन और एकजुटता के साथ आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पति-पत्नी ने अपने परिवार में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। आज उनकी यही सोच परिवार की अगली पीढ़ियों में दिखाई देती है।
एक परिवार, जिसमें शिक्षा और चिकित्सा बनी पहचान :
चंद्रशेखर यादव एवं स्वर्गीय माधुरी देवी के परिवार में शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, तकनीक और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अनेक सदस्य अपनी पहचान बना रहे हैं। उनके परिवार में डॉ. विवेकानंद, दयानंद कुमार, इंजीनियर धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अमर सत्यम, डॉ. अनुज, नरेंद्र कुमार, डॉ. मणि भूषण, डॉ. जयशंकर, डॉ. शशी कुमार, डॉ. कुमार सर्वप्रिय, डॉ. प्रिया कुमारी, डॉ. रंजीत कुमार, डॉ. कुमार विश्वप्रिय, डॉ. अमिष कुमार, डॉ. तनय, डॉ. पिहू कुमारी, दिग्विजय, डॉ. पुष्पलता कुमारी, डॉ. रामानंद प्रसाद यादव, डॉ. इंदु कुमारी, डॉ. आलोक भारती, डॉ. रीना रूबी, भारती कुमारी, डॉ. प्रीति कुमारी, सवर्णता कुमारी, ममता कुमारी, प्रियंका कुमारी, डॉ. रवि रंजन, डॉ. प्रीति कुमारी, डॉ. पूजा कुमारी, स्वीटी कुमारी, ऐनी कुमारी, परी कुमारी सहित परिवार के अन्य सदस्य शामिल हैं। इतने बड़े परिवार में शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी संख्या में सदस्यों की सक्रियता अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि चंद्रशेखर यादव और स्वर्गीय माधुरी देवी ने अपने बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार की कितनी मजबूत विरासत दी।
डॉ. विवेकानंद की दूरगामी सोच ने बदली तस्वीर
इस परिवार में बड़े पुत्र डॉ. एस विवेकानंद की दूरगामी सोच ने खगड़िया में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नई दिशा देने का काम किया। उनके विजन और प्रयासों से जिले को मेडिकल कॉलेज सहित कई शैक्षणिक एवं तकनीकी संस्थानों की सौगात मिली। शहीद प्रभु नारायण मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल, श्याम लाल चंद्रशेखर नर्सिंग कॉलेज, राजमाता माधुरी टीचर ट्रेनिंग कॉलेज और श्याम लाल चंद्रशेखर मेडिकल कॉलेज सहित अन्य संस्थान आज शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इन संस्थानों में खगड़िया ही नहीं, बल्कि बिहार के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी और प्रशिक्षणार्थी पहुंच रहे हैं। यहां शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अनेक युवा सरकारी अथवा गैर-सरकारी क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त कर अपने जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
डॉ. विवेकानंद, इंजीनियर धर्मेंद्र और डॉ. सत्यम सहित परिजनों ने मिलकर बढ़ाया कारवां
इस पूरी यात्रा की सबसे खास बात यह है कि डॉ. विवेकानंद, इंजीनियर धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अमर सत्यम सहित परिवार के अन्य परिजनों ने कदम से कदम मिलाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत विकास के इस कारवां को आगे बढ़ाया। जहां डॉ. विवेकानंद की दूरदर्शी सोच ने बड़े संस्थानों की परिकल्पना को आकार दिया, वहीं इंजीनियर धर्मेंद्र कुमार सहित परिवार के अन्य सदस्यों ने अपनी विशेषज्ञता और अनुभव के माध्यम से इस यात्रा को मजबूती प्रदान की। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े परिवार के अनेक सदस्यों ने भी स्वास्थ्य सेवा और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया। यह सामूहिक प्रयास इस बात का उदाहरण है कि जब परिवार के सदस्य व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर एक साझा उद्देश्य और सामाजिक सरोकार के साथ काम करते हैं, तो उसका लाभ पूरे समाज को मिलता है।
सबसे बड़ी बात—डॉ. रीना रूबी भी कदम से कदम मिलाकर साथ
डॉ. विवेकानंद की इस दूरगामी सोच और सेवा की यात्रा में उनकी धर्मपत्नी डॉ. रीना रूबी भी कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में परिवार की सोच को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका भी उल्लेखनीय है।पति-पत्नी की यह साझी सोच इस परिवार की उस परंपरा को दर्शाती है, जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।
माधुरी देवी के संस्कारों की छाप
चंद्रशेखर यादव की धर्मपत्नी स्वर्गीय माधुरी देवी आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन परिवार की उपलब्धियों और संस्कारों में उनकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने परिवार को जोड़कर रखने और बच्चों में शिक्षा, अनुशासन तथा संस्कार विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आज जब परिवार के इतने सदस्य चिकित्सा, शिक्षा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं, तो इसके पीछे माता-पिता द्वारा दी गई मजबूत पारिवारिक एवं शैक्षणिक नींव दिखाई देती है।
पिता प्रधानाध्यापक रहे, बेटे ने शिक्षा को संस्थानों का रूप दिया
चंद्रशेखर यादव का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक शिक्षक की सोच कितनी दूर तक प्रभाव डाल सकती है। वे स्वयं प्रधानाध्यापक रहे और उन्होंने शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनके बड़े पुत्र डॉ. विवेकानंद ने उसी विचार को व्यापक रूप देते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थानों के निर्माण और विकास की दिशा में काम किया। एक ओर पिता ने कक्षा और विद्यालय के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा दी, वहीं अगली पीढ़ी ने मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, टीचर ट्रेनिंग कॉलेज और मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल जैसे संस्थानों के माध्यम से शिक्षा एवं स्वास्थ्य की पहुंच को व्यापक बनाने का प्रयास किया। इस पूरी कहानी का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पक्ष है 99 वर्षीय चंद्रशेखर यादव का आज भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ना। यह केवल उनकी अच्छी दृष्टि का उदाहरण नहीं, बल्कि ज्ञान और समाज से जुड़े रहने की उनकी जीवंत इच्छा का प्रतीक है।जिस व्यक्ति ने जीवनभर विद्यार्थियों को ज्ञान का महत्व समझाया, वह स्वयं आज भी समाचार-पत्र के माध्यम से देश-दुनिया की गतिविधियों से जुड़े रहते हैं। उनकी यह आदत नई पीढ़ी को संदेश देती है कि सीखने, पढ़ने और जागरूक रहने की कोई उम्र नहीं होती।
शिक्षा की विरासत से समाज की सेवा तक
चंद्रशेखर यादव और स्वर्गीय माधुरी देवी ने अपने परिवार में शिक्षा का जो बीज बोया, वह आज एक विशाल वृक्ष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। परिवार के अनेक सदस्य चिकित्सा, शिक्षा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं, वहीं परिवार से जुड़े संस्थान खगड़िया और आसपास के युवाओं को शिक्षा एवं रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं।एक पिता प्रधानाध्यापक थे, मां संस्कारों की आधारशिला थीं, बेटों और परिजनों ने कदम से कदम मिलाकर उस विरासत को आगे बढ़ाया और आज उसी परिवार की सोच से खगड़िया में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। 99 वर्ष की उम्र में भी अखबार पढ़ते चंद्रशेखर यादव की आंखों में आज भी वही जिज्ञासा है। शायद यही उस शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान है, जिसने अपनी जिंदगी में शिक्षा को केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जीकर पहुंचाया।
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