जागरूकता अभियान: मोबाइल बन रहा ‘डिजिटल ड्रग’… बर्बाद हो रहा बचपन.. राजीव चौहान ने जताई गहरी चिंता…अभिभावकों को दिए पांच असरदार सुझाव..

जागरूकता अभियान: मोबाइल बन रहा ‘डिजिटल ड्रग’… बर्बाद हो रहा बचपन.. राजीव चौहान ने जताई गहरी चिंता…अभिभावकों को दिए पांच असरदार सुझाव..
खगड़िया/ कौशी एक्सप्रेस/ कोशी साइंस क्लासेज के निदेशक राजीव चौहान ने जानकारी साझा करते हुए कहा  कि तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन यही तकनीक अब नई पीढ़ी के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। ऑनलाइन शिक्षा, मनोरंजन और सूचना के नाम पर बच्चों के हाथों में पहुंचा मोबाइल अब धीरे-धीरे एक खतरनाक लत का रूप ले चुका है। यह केवल एक उपकरण नहीं रह गया है, बल्कि ऐसा अदृश्य जाल बन गया है जो बच्चों के शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास को प्रभावित कर रहा है।
नींद छिन रही, बढ़ रहा तनाव
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों की आंखों और मस्तिष्क पर प्रतिकूल असर डालती है। देर रात तक मोबाइल देखने से उनकी नींद प्रभावित होती है, जिससे अगले दिन चिड़चिड़ापन, थकान और पढ़ाई में ध्यान की कमी देखने को मिलती है। लगातार स्क्रीन पर रहने वाले बच्चों में तनाव, चिंता और अकेलेपन की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है।
रील्स और गेम्स ने छीना बचपन :  आज खेल के मैदानों की जगह मोबाइल गेम्स ने ले ली है और कहानी की किताबों की जगह रील्स व शॉर्ट वीडियो ने। एल्गोरिदम आधारित कंटेंट बच्चों के मस्तिष्क को बार-बार स्क्रीन की ओर खींचता है, जिससे उनमें मोबाइल देखने की आदत नहीं बल्कि लत विकसित हो रही है। इससे उनकी रचनात्मक सोच, कल्पनाशक्ति और सामाजिक व्यवहार कमजोर हो रहा है।
रिश्तों से दूरी, आभासी दुनिया से नजदीकी :  बच्चे अब परिवार और समाज से जुड़ने के बजाय मोबाइल की आभासी दुनिया में सुकून तलाश रहे हैं। लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स के पीछे भागती यह पीढ़ी वास्तविक संवाद और संवेदनाओं से दूर होती जा रही है। यह स्थिति भविष्य के लिए चिंताजनक संकेत है।
अभिभावक निभाएं जिम्मेदारी : शिक्षाविद राजीव चौहान ने कहा कि समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित उपयोग है। बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर करना समाधान नहीं, बल्कि सही उपयोग सिखाना आवश्यक है। अभिभावकों को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, क्योंकि बच्चा वही सीखता है जो घर में देखता है।
अभिभावकों के लिए पांच महत्वपूर्ण सुझाव
1. नो गैजेट ज़ोन बनाएं : भोजन स्थल और शयनकक्ष में मोबाइल का उपयोग बंद करें।
2. समय सीमा तय करें : बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करें।
3. बेहतर विकल्प दें : खेल, पुस्तक, संगीत, चित्रकला जैसी गतिविधियों से जोड़ें।
4. संवाद बढ़ाएं : रोज कम से कम 30 मिनट बच्चों से खुलकर बात करें।
5. निगरानी रखें : मोबाइल में पैरेंटल कंट्रोल लगाकर सामग्री पर नजर रखें।
समय रहते चेतने की जरूरत :  यदि आज इस समस्या पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो आने वाली पीढ़ी तकनीकी रूप से सक्षम लेकिन मानसिक रूप से कमजोर हो सकती है। बच्चों को फिर से प्रकृति, पुस्तकों और खेल के मैदानों से जोड़ना समय की मांग है।
जनहित में अपील : हम सबको मिलकर संकल्प लेना होगा कि बच्चों को तकनीक का गुलाम नहीं, बल्कि उसका समझदार उपयोगकर्ता बनाएंगे।
“आपका बच्चा आपका भविष्य है, उसे डिजिटल धुंध में खोने न दें।”

 

नोट- प्रसारित समाचार की जिम्मेवारी प्रेस की नहीं है तथा विज्ञापनों की प्रामाणिकता से प्रेस का कोई सबंध नहीं है – संपादक

 

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